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मुंबई उपनगरीय उपभोक्ता आयोग का बड़ा फैसलाविदेश में कैंसर इलाज का दावा खारिज करना बीमा कंपनी को पड़ा महंगा; ग्राहक को मिलेगा ₹66.50 लाख मुआवजा


मुंबई उपनगरीय जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम निर्णय में एक बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह शहर के निवासी अलोक राजेंद्र बेक्टर को ₹66.50 लाख की राशि दो महीनों के भीतर अदा करे। आयोग ने माना कि कंपनी ने उनके विदेशी कैंसर उपचार के दावे को गलत तरीके से खारिज किया और अनुचित व्यापार व्यवहार अपनाया। इसके अलावा आयोग ने बीमा कंपनी पर ₹30,000 मुआवजा और ₹10,000 मुकदमा खर्च भी लगाया है।

मामला क्या है?

अलोक बेक्टर ने वर्ष 2017 में अपने और अपने बेटे के लिए एक वर्ल्डवाइड मेडिकल इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदी थी, जिसमें ₹65 लाख तक का कवरेज शामिल था।
1 अगस्त 2018 को उन्हें कैंसर का पता चला। प्रारंभिक इलाज मुम्बई में कराने के बाद वे अमेरिका के प्रतिष्ठित मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर रिसर्च सेंटर में उपचार के लिए गए।
उन्होंने पॉलिसी के अनुसार बीमा कंपनी को पहले ही विदेश उपचार की सूचना दे दी थी।

पहला दावा क्यों खारिज हुआ?

कंपनी ने उनका पहला दावा यह कहते हुए ठुकरा दिया कि उन्होंने अस्थमा का अपना पूर्व इतिहास छिपाया था। इसके बाद दिसंबर 2019 में कंपनी ने उनकी पूरी पॉलिसी ही रद्द कर दी।

बेक्टर ने यह मामला इंश्योरेंस ओम्बड्समैन के सामने उठाया। ओम्बड्समैन ने साफ कहा कि अस्थमा का कोलोरेक्टल कैंसर (बड़ी आंत का कैंसर) से कोई संबंध नहीं है। इसके बाद कंपनी को बेक्टर का पुराना दावा आंशिक रूप से चुकाना पड़ा। इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ कि पॉलिसी रद्द करना अनुचित था।

दूसरा दावा और कंपनी का नया तर्क

बेक्टर ने अमेरिका में मार्च 2019 से मार्च 2020 के बीच इलाज पर ₹88,34,560 खर्च किए। जब उन्होंने बीमा कंपनी से दावा किया, तो कंपनी ने फिर से इंकार कर दिया।
इस बार कंपनी ने कहा कि विदेश में इलाज सिर्फ कैशलेस मोड में ही मान्य है और पॉलिसी रिइम्बर्समेंट (प्रतिपूर्ति) मोड की अनुमति नहीं देती।

आयोग ने कंपनी का बचाव क्यों खारिज किया?

उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट कहा कि—

  • जब पॉलिसी कंपनी ने खुद रद्द कर दी थी, तो बेक्टर कैशलेस इलाज की पूर्व अनुमति कैसे ले सकते थे?
  • कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि अस्थमा का कैंसर से कोई संबंध है।

आयोग के अनुसार, बीमा कंपनी के फैसले ने बेक्टर को उस समय वित्तीय और मानसिक रूप से परेशान किया जब उन्हें जीवन रक्षक उपचार की सबसे अधिक आवश्यकता थी।

अंतिम आदेश

आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि—

  • ₹66.50 लाख की राशि 60 दिनों के भीतर अदा की जाए।
  • समय पर भुगतान न करने पर 6% वार्षिक ब्याज लागू होगा।
  • साथ ही ₹30,000 मानसिक प्रताड़ना मुआवजा और ₹10,000 मुकदमा खर्च भी दिया जाए।

यह फैसला बीमा कंपनियों को स्पष्ट संदेश देता है कि वे पॉलिसीधारकों के साथ अनुचित व्यवहार नहीं कर सकतीं—खासकर तब, जब मामला किसी गंभीर बीमारी के इलाज का हो।

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