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छह साल बाद मिला न्याय: बीएमसी क्लीन-अप मार्शल को झूठे उगाही केस से कोर्ट ने बरी किया।


मुंबई के सोमनाथ नानासो शेल्के, 30 वर्षीय टैटू आर्टिस्ट और पूर्व बीएमसी क्लीन-अप मार्शल, को आखिरकार छह वर्षों बाद इंसाफ मिल गया है। एस्प्लेनेड कोर्ट ने उन्हें उस उगाही मामले से बरी कर दिया है, जिसमें उनके ही वरिष्ठों ने उन्हें फंसाया था।

शेल्के ने बताया कि 2019 में जब वे प्रशिक्षण पर मरीन ड्राइव पर तैनात थे, तभी उन्हें पता चला कि उनके कुछ वरिष्ठ क्लीन-अप मार्शल लोगों से जबरन पैसे वसूल रहे थे। कचरा फेंकते पकड़ने पर वे असली जुर्माना ₹200 होने के बावजूद ₹500 से ₹3000 तक की वसूली करते थे।

कैसे फंसे शेल्के?

19 सितंबर 2019 को एक घटना में वरिष्ठ संतोष अशोक शिंदे और उनकी टीम ने सड़क पर रैपर फेंकने वाले एक समूह से खुद को पुलिस बताकर ₹3500 वसूले और फरार हो गए। इसकी शिकायत मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में हुई। पुलिस ने शिंदे को गिरफ्तार किया, लेकिन उसने बचने के लिए शेल्के का नाम बता दिया।

इसके बाद शेल्के को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
“मैंने पुलिस को बार-बार बताया कि मैं निर्दोष हूं, मेरे पास तो फाइन बुक भी नहीं थी। मैं सिर्फ प्रशिक्षण पर था, पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी,” शेल्के ने बताया।

दो हफ्ते जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिली, लेकिन केस के चलते उनकी नौकरी के सभी प्रयास असफल होते रहे, क्योंकि बैकग्राउंड चेक में केस दिख जाता था।

कोर्ट ने कैसे दिया न्याय?

शेल्के के वकील अधिवक्ता सुनील पांडे ने अदालत में बताया कि—

  • शेल्के के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था
  • किसी भी कथित पीड़ित का पता या बयान सत्यापित नहीं था
  • मुख्य आरोपी शिंदे ने निजी रंजिश के कारण शेल्के का नाम लिया था
  • पूरा उगाही रैकेट शिंदे और उसकी टीम चलाती थी

क्रॉस-एग्जामिनेशन में जांच अधिकारी ने भी यह मान लिया कि शिंदे को शेल्के से व्यक्तिगत शिकायत थी।

इन सभी आधारों पर अदालत ने शेल्के को पूरी तरह बरी कर दिया।

शेल्के की प्रतिक्रिया

“मैंने छह साल बहुत तकलीफ झेली है। नौकरी नहीं मिली, समाज में बदनामी हुई। लेकिन आखिरकार कोर्ट ने मुझे निर्दोष साबित किया। मैं बहुत खुश हूं कि मुझे न्याय मिला,” शेल्के ने कहा।

वकील बोले—सिस्टम ने एक निर्दोष को फंसाया

अधिवक्ता पांडे ने कहा, “शेल्के हाल ही में नौकरी पर आए थे और प्रशिक्षण में थे। असली उगाही शिंदे और उसकी टीम कर रहे थे। झूठे केस में फंसाकर उन्होंने अपना बचाव किया।”

सोमनाथ शेल्के की यह जीत न केवल एक निर्दोष युवक की लड़ाई का अंत है, बल्कि यह भी बताती है कि सिस्टम की कमियों के बावजूद सच देर-सबेर सामने आता ही है।

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