मुंबई, अगस्त 2025।
मुंबई की सदियों पुरानी कबूतरखाना परंपरा अब विवादों में घिर गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाने का आदेश दिया है। अदालत का कहना है कि कबूतरों की बढ़ती संख्या से न सिर्फ स्वास्थ्य खतरे में है, बल्कि शहर की धरोहरें भी प्रभावित हो रही हैं। इस फैसले के बाद धार्मिक संगठनों और नागरिकों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है।
स्वास्थ्य को बड़ा खतरा
डॉक्टरों का कहना है कि कबूतरों की बीट और पंखों से निकलने वाला धूलकण गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।
एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, कबूतरों की बीट में मौजूद फफूंद और बैक्टीरिया हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस (HP) नामक फेफड़ों की बीमारी को जन्म देते हैं। यह बीमारी धीरे-धीरे फेफड़ों को खराब कर देती है और गंभीर स्थिति में मरीज की जान भी जा सकती है।
मुंबई के फेफड़ा रोग विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में कबूतरों से जुड़ी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसके अलावा कबूतरों की अम्लीय बीट ऐतिहासिक धरोहरों जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस की इमारत को भी नुकसान पहुंचा रही है।
परंपरा और आस्था का सवाल
मुंबई में कबूतरखाना सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। खासतौर पर जैन और गुजराती समाज में कबूतरों को दाना डालना दया और अहिंसा का प्रतीक माना जाता है। कई धार्मिक लोग इसे पुण्य का काम मानते हैं।
लेकिन अदालत का कहना है कि आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण को भी ध्यान में रखना जरूरी है। इसी वजह से कई जगहों पर कबूतरखाने बंद किए गए हैं और उल्लंघन करने वालों पर आपराधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। इससे धार्मिक समुदाय में नाराज़गी फैल गई है और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
समाधान की तलाश
सरकार और प्रशासन फिलहाल बीच का रास्ता खोजने में जुटे हैं।
कुछ प्रस्ताव सामने आए हैं –
- कबूतरों को भीड़भाड़ वाले इलाकों में दाना डालने पर रोक।
- साफ-सफाई और स्वास्थ्य निगरानी के साथ नियंत्रित फीडिंग ज़ोन बनाए जाएं।
- कबूतरों की बीट की सफाई के दौरान मास्क और सुरक्षा उपकरण का इस्तेमाल।
- धार्मिक समुदाय और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की संयुक्त समिति बनाकर समाधान।
‘द लॉजिकल इंडियन’ का नज़रिया
मुंबई का यह विवाद दिखाता है कि परंपरा और आधुनिक स्वास्थ्य जरूरतें कभी-कभी आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं। कबूतरों को दाना डालने की परंपरा करुणा और दया से जुड़ी है, लेकिन वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि यह जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
जरूरत है संवाद की – न तो परंपरा पूरी तरह खत्म हो और न ही लोगों का स्वास्थ्य दांव पर लगे। अगर आस्था और विज्ञान के बीच संतुलन बनाया जाए, तो मुंबई एक ऐसी मिसाल पेश कर सकती है जो देशभर के शहरों को रास्ता दिखाए।
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