नई दिल्ली / मुंबई:
भारत के समुद्री तटों के पास पुराने और संदिग्ध तेल टैंकरों का एक “छाया बेड़ा” (Shadow Fleet) सक्रिय होने को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने गंभीर चिंता जताई है। इन जहाजों को आम तौर पर “घोस्ट ऑयल टैंकर” कहा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये जहाज भारत के लिए तीन तरह के बड़े खतरे पैदा कर रहे हैं—पर्यावरणीय आपदा, समुद्री दुर्घटनाएं और घरेलू ईंधन कीमतों में अचानक उछाल।
सरकारी सूत्रों के अनुसार पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से कच्चा तेल खरीद रहा है। इसी दौरान रूस, ईरान और वेनेजुएला जैसे प्रतिबंधों का सामना कर रहे देशों से तेल लाने वाले कई संदिग्ध टैंकर भारत के समुद्री मार्गों के आसपास देखे जा रहे हैं। इन जहाजों के संचालक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और नियमों से बचने के लिए कई तरह की चालाकियां अपनाते हैं।
जहाज कैसे छिपाते हैं अपनी गतिविधियां
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार ये टैंकर अक्सर अपनी पहचान छिपाने के लिए ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं, जिससे उनकी लोकेशन का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
इसके अलावा इन जहाजों का मालिकाना हक कई बार शेल कंपनियों के नाम पर होता है, जिनकी असली पहचान स्पष्ट नहीं होती। कई जहाज ऐसे देशों का झंडा इस्तेमाल करते हैं जहां समुद्री नियमों की निगरानी बहुत कमजोर होती है।
सूत्रों का कहना है कि कुछ मामलों में समुद्र के बीच ही एक जहाज से दूसरे जहाज में कच्चे तेल का ट्रांसफर भी किया जाता है। मुंबई तट के आसपास ऐसे घटनाक्रम सामने आने की भी चर्चा है।
पुराने और जर्जर जहाज बढ़ा रहे खतरा
अधिकारियों के मुताबिक इन टैंकरों की हालत भी चिंता का विषय है। इनमें से कई जहाज 15 से 30 साल पुराने हैं और पहले लगभग कबाड़ की स्थिति में पहुंच चुके थे।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे जहाजों में तकनीकी खराबी, आग लगने, इंजन फेल होने या टकराव का खतरा अधिक रहता है। अगर अरब सागर या भारतीय महासागर में किसी बड़े बंदरगाह—जैसे मुंबई, चेन्नई, पारादीप या वडिनार—के पास कोई दुर्घटना होती है, तो इसका असर बेहद गंभीर हो सकता है।
पर्यावरण पर पड़ सकता है भारी असर
समुद्र में तेल रिसाव की स्थिति में मछली पालन, समुद्री जीव और तटीय पारिस्थितिकी को भारी नुकसान हो सकता है। खासकर मैंग्रोव जंगल, समुद्री तट और स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि ऐसे जहाजों का बीमा या तो बहुत सीमित होता है या कई बार होता ही नहीं। इसलिए अगर कोई दुर्घटना होती है तो सफाई और मुआवजे का भारी खर्च भारत सरकार को उठाना पड़ सकता है।
भू-राजनीतिक दबाव भी बढ़ सकता है
भारत द्वारा सस्ते कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका और पश्चिमी देशों ने पहले भी चिंता जताई है। यदि ऐसे “डार्क फ्लीट” जहाजों से जुड़ी कोई बड़ी घटना होती है या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब्ती की कार्रवाई बढ़ती है, तो भारत की तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में देश को अमेरिका, इराक या सऊदी अरब जैसे स्रोतों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारतीय कंपनियों पर भी उठ रहे सवाल
सूत्रों के मुताबिक इन संदिग्ध जहाजों का प्रबंधन करने वाली कुछ कंपनियों के भारत से जुड़े होने की भी बात सामने आई है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की समुद्री छवि पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
इन जहाजों में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा और कामकाजी हालात को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कई बार ऐसी परिस्थितियों में भारतीय नौसेना या तटरक्षक बल को बचाव अभियान चलाना पड़ सकता है।
संतुलन बनाने की कोशिश
तेल कंपनियां और सरकार इस स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं। हाल के समय में कुछ बड़ी रिफाइनरी कंपनियों ने ऐसे टैंकरों से तेल खरीदने को लेकर सावधानी बरतनी शुरू की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और समुद्री सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए सख्त नियामक व्यवस्था विकसित करनी होगी, ताकि देश के समुद्री क्षेत्र, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा की रक्षा की जा सके।
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