रविवार को शहर में आयोजित मैराथन अधिकतर लोगों के लिए फिटनेस, जोश और जश्न का मौका थी, लेकिन कचरा बीनने वाले शंकर कुमार और उनकी पत्नी रेखा के लिए यह दिन रोज़मर्रा की जद्दोजहद से राहत लेकर आया। इस एक दिन में उन्होंने लगभग उतनी कमाई कर ली, जितनी आमतौर पर पूरे एक हफ्ते में होती है।
हज़ारों धावकों और दर्शकों के बीच, जब सड़क किनारे खाली प्लास्टिक की बोतलें, कप और खाने के रैपर बिखरे पड़े थे, तब शंकर और रेखा चुपचाप अपना काम करते रहे। दिन के अंत तक उन्होंने करीब 60 किलो प्लास्टिक कचरा इकट्ठा कर लिया, जो उनके अनुसार एक हफ्ते की सामान्य कमाई के बराबर है।
शंकर कुमार ने बताया कि आम दिनों में उन्हें अलग-अलग इलाकों में भटककर थोड़ा-थोड़ा प्लास्टिक इकट्ठा करना पड़ता है। “लेकिन आज का दिन ऐसा रहा जैसे पूरा हफ्ता एक ही दिन में निकल गया,” उन्होंने कहा।
कुमार को कबाड़ी से प्लास्टिक के करीब 15 रुपये प्रति किलो मिलते हैं। इस हिसाब से उनकी एक दिन की कमाई लगभग 900 से 1000 रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। प्लास्टिक का वजन अभी तौला नहीं गया था, लेकिन शंकर का कहना है कि वर्षों के अनुभव से उन्हें अंदाज़ा लगाना आ गया है।
मैराथन के दौरान स्वयंसेवकों द्वारा बांटी गई पानी की बोतलें, बाद में कचरा बीनने वालों के लिए कमाई का बड़ा ज़रिया बन गईं।
शंकर कहते हैं, “ऐसे बड़े कार्यक्रम हमारे लिए मौका होते हैं, लेकिन हमारे काम को न तो पहचान मिलती है और न ही कोई सहारा। जबकि हम शहर को साफ रखने और कचरे को रीसायकल करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।”
उन्होंने बताया कि इसी कठिन ज़िंदगी के कारण वे नहीं चाहते कि उनका बेटा यही काम करे। “मैं चाहता हूं कि वह पढ़े-लिखे और किसी एसी ऑफिस में नौकरी करे,” शंकर ने कहा।
रविवार को उनके साथ उनका 8 साल का बेटा विक्की भी था, जिसे स्कूल की छुट्टी थी। दक्षिण मुंबई के एक बीएमसी स्कूल में पढ़ने वाला विक्की बोला, “मेरे हाथ छोटे हैं, लेकिन मैं मम्मी-पापा की मदद कर सकता हूं। खाली खेलने से अच्छा है उनके साथ रहना।”
मैराथन जैसे बड़े आयोजन जहां एक ओर बड़ी मात्रा में सिंगल-यूज़ प्लास्टिक कचरा पैदा करते हैं, वहीं दूसरी ओर ये उन अदृश्य मेहनतकशों की ओर भी ध्यान खींचते हैं, जो शहर की गंदगी को चुपचाप समेट लेते हैं — बिना नाम, बिना पहचान।
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