महाराष्ट्र के स्कूल शिक्षा विभाग के सामने इस समय एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। राज्य के करीब 10 लाख से अधिक छात्र “आउट ऑफ स्कूल” यानी स्कूल से बाहर दर्ज होने के खतरे में हैं, जबकि वे नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित हो रहे हैं। इसका कारण है — आधार सत्यापन में हुई तकनीकी गड़बड़ियां।
राज्य के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल 2,14,68,288 विद्यार्थियों में से 2,09,69,529 छात्रों ने अपने आधार विवरण जमा किए हैं। इनमें से 2,03,21,408 छात्रों के आधार नंबर सत्यापित हो चुके हैं, जबकि 5,78,433 नंबर अमान्य पाए गए हैं। इसके अलावा 4,98,759 छात्रों ने अब तक आधार विवरण प्रस्तुत नहीं किए हैं, जिससे उनकी नामावली संकट में पड़ गई है। वहीं 69,688 छात्रों का डेटा अब भी सत्यापन के अधीन है।
इस प्रकार, कुल मिलाकर लगभग 10,77,000 छात्र सरकारी रिकॉर्ड में ‘स्कूल से बाहर’ के रूप में दर्ज हो सकते हैं, जिससे उनकी शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
स्कूल शिक्षा विभाग ने सभी विद्यालयों को आदेश दिया है कि वे अपने छात्रों का आधार विवरण यू-डीआईएसई प्लस (UDISE Plus) पोर्टल पर तुरंत अपडेट करें, क्योंकि यही डाटा शिक्षकों की नियुक्ति, स्टाफ संख्या और शैक्षणिक संसाधनों के आवंटन को प्रभावित करता है।
इस मुद्दे पर शिक्षक संघों और शिक्षा विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि केवल तकनीकी त्रुटियों के आधार पर किसी बच्चे को ‘स्कूल से बाहर’ मानना शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम का उल्लंघन है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि यह समस्या जल्द हल नहीं हुई, तो कई स्कूलों में स्टाफ कटौती, अनुदान में कमी और विद्यालय बंद होने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं — खासकर ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में।
विभागीय अधिकारियों ने माना है कि यह समस्या वास्तविक है और डेटा में आ रही विसंगतियों को दूर करने के लिए प्रयास जारी हैं। उन्होंने सभी स्कूलों से अपील की है कि वे अपने छात्रों का विवरण दोबारा सत्यापित करें ताकि किसी भी बच्चे की शैक्षणिक स्थिति प्रभावित न हो।
यह पूरा मामला इस बात को रेखांकित करता है कि शिक्षा व्यवस्था में डिजिटल डाटाबेस पर बढ़ती निर्भरता के चलते अब छोटी-सी तकनीकी गड़बड़ी भी लाखों छात्रों के भविष्य पर असर डाल सकती है।
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