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मुंबई डब्बावाला क्राइसिस: कमर्शियल LPG की किल्लत से 150 साल पुरानी परंपरा पर संकट, कमाई आधी हुई।


मुंबई की पहचान बन चुका 150 साल पुराना डब्बावाला सिस्टम इस समय अपने सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। कमर्शियल LPG सिलेंडरों की भारी कमी के कारण शहर के मेस, टिफिन किचन और क्लाउड किचन बुरी तरह प्रभावित हैं। इससे रोजाना बनने वाले टिफिन की संख्या में बड़ी गिरावट आई है और करीब 5,000 डब्बावालों की आमदनी लगभग आधी रह गई है।
सड़क से स्टेशन तक—डब्बावालों की रफ्तार अब धीमी
चर्चगेट, दादर, बांद्रा और अन्य उपनगरीय इलाकों में सुबह के समय हजारों टिफिन लेकर साइकिल और ट्रेनों में दौड़ते डब्बावाले मुंबई की जीवनशैली का हिस्सा रहे हैं।
लेकिन गैस की आपूर्ति बाधित होने से कई किचन बंद हो गए हैं और बचे हुए भी सीमित मेन्यू पर काम कर रहे हैं। नतीजतन, डब्बावालों के पास पहुंचने वाला टिफिन वॉल्यूम पहले की तुलना में 40–50% तक घट गया है।
संकट की वजह: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में शिपिंग बाधित
मार्च 2026 में इजरायल–अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाज़ों की आवाजाही प्रभावित हुई।
भारत का 60–90% LPG आयात इसी रूट से आता है।
इसके बाद सरकार ने घरेलू LPG को प्राथमिकता देते हुए कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई सीमित कर दी।
परिणाम:
कमर्शियल LPG सिलेंडरों की भारी कमी
होटल, मेस व टिफिन किचन 20–30% तक प्रभावित
मुंबई में डब्बावालों तक सीधा असर
डब्बावाला एसोसिएशन की प्रतिक्रिया
डब्बावाला एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी किरण गावंडे ने बताया:
“गैस सिलेंडर न मिलने से मेस और छोटे किचन वाले ग्राहक घट गए। पहले रोज हजारों टिफिन डिलीवर होते थे, अब संख्या में भारी गिरावट है। कमाई आधी रह गई है।”
एसोसिएशन के अध्यक्ष उल्हास मुके का कहना है:
“150 साल से बिना रुके चलने वाला यह सिस्टम पहली बार इतनी बड़ी समस्या में है। कई मेस बंद हो गए हैं, टिफिन कम हो रहे हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे तो जीविका पर संकट गहरा जाएगा।”
प्रवक्ता विष्णु कालडोके के अनुसार,
“सबसे ज्यादा असर उन किचन पर है जो बड़े पैमाने पर टिफिन तैयार करते हैं। घरों से बनने वाले पारंपरिक टिफिन पर असर कम है, लेकिन कुल मिलाकर डब्बावालों की आय आधी हो चुकी है।”
टिफिन मालिकों की जमीनी हकीकत
जयसिंह पिंगले (2009 से टिफिन सर्विस):
500 टिफिन से अब 300 पर आ गए। गैस न मिलने पर सिगड़ी और लकड़ी के चूल्हे का सहारा।
उर्जित आवारी (चर्चगेट):
दो हफ्तों से एक भी सिलेंडर नहीं। इलेक्ट्रिक कॉइल स्टोव पर काम। मेन्यू सीमित—रोटी, एक शाकाहारी, एक मांसाहारी, दाल–चावल।
रवि गोपाले:
14 किलो सिलेंडर पहले ₹920, अब ₹2500–₹3000। रोटी–सब्जी ₹120 से बढ़कर ₹135 (डिलीवरी सहित ₹175)। पांच महिलाओं को काम से निकालना पड़ा।
LPG ब्लैक मार्केटिंग की भी शिकायत
आधिकारिक कीमत ₹1800–2000 वाले सिलेंडर ₹2500–3500 तक बिक रहे हैं। कई ऑपरेटर्स का आरोप है कि संकट का फायदा उठाकर ब्लैक मार्केटिंग की जा रही है।
टिफिन की कीमतें भी पूर्व की तुलना में 10–20% बढ़ गई हैं।
सरकार के कदम
रिफाइनरियों को LPG उत्पादन 25–38% बढ़ाने का निर्देश
21 मार्च से कमर्शियल LPG आवंटन 30% से बढ़ाकर 50%
ब्लैक मार्केटिंग पर छापे व FIR
PNG (पाइप्ड गैस) पर शिफ्ट होने की सलाह
महाराष्ट्र सरकार का अतिरिक्त आवंटन लागू
फिर भी टिफिन ऑपरेटरों का कहना है कि गैस पाने में अभी भी 5–6 दिन का इंतज़ार करना पड़ रहा है।
मुंबई डब्बावालों की विरासत पर खतरा?
मुंबई में रोजाना लगभग 2 लाख टिफिन सप्लाई होते थे।
150 साल में डब्बावाला सिस्टम ने
बाढ़
ट्रेनों में विस्फोट
26/11
और COVID लॉकडाउन
जैसे संकटों में भी अपनी सेवा नहीं रोकी।
परंतु मौजूदा गैस संकट ने इस प्रणाली की नींव को हिला दिया है। हालांकि सरकार द्वारा 20% अतिरिक्त आवंटन की घोषणा से उम्मीद जगी है कि जल्द सप्लाई सामान्य हो सकती है।
निष्कर्ष
मुंबई के लिए डब्बा सिर्फ खाना नहीं—यह भरोसा, अनुशासन और रोजमर्रा की जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। LPG संकट जितनी जल्दी खत्म होगा, उतनी जल्दी यह ऐतिहासिक ‘अंगीठी’ फिर से गर्म हो उठेगी।

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